करेड़ा में पौराणिक लोकनाट्य ‘गवरी’ का विसर्जन, गौ संरक्षण का दिया संदेश
राजसमंद। मेवाड़ की प्रसिद्ध भील लोकपरंपरा ‘गवरी’ केवल नृत्य और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं, लोकजीवन और सामाजिक अनुभवों को मंच पर प्रस्तुत करने वाली जीवंत लोकनाट्य परंपरा है। समीपवर्ती करेड़ा (सियाणा) में गवरी के समापन अवसर पर विभिन्न पारंपरिक खेलों का मंचन किया गया। इस दौरान लोकपरंपरा के माध्यम से सामाजिक समरसता, गौ संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया।
पाबू जी राठौड़ के खेल से गौ संरक्षण का संदेश
करेड़ा की गवरी में लोकदेवता पाबू जी राठौड़ के खेल का मंचन किया गया। लोक मान्यता के अनुसार पाबू जी राठौड़ ने गौ रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। गवरी कलाकारों ने उनके जीवन प्रसंग का मंचन करते हुए गौ संरक्षण का संदेश आमजन तक पहुंचाया।
विवाह की रस्म के दौरान गायों की रक्षा के लिए पाबू जी के संघर्ष का जीवंत मंचन किया गया। इस दौरान दर्शकों की ओर से कलाकारों को खोल (उपहार) राशि भेंट की गई। गवरी कलाकारों ने इस राशि को श्री धेनु गोपाल गौ सेवा समिति, सियाणा की गौशाला में भेंट कर दिया। इस पहल के माध्यम से लोकपरंपरा को सामाजिक सेवा से जोड़ा गया।
लोकखेलों में सामाजिक जीवन की झलक
गवरी में प्रस्तुत ‘कान-गुजरी’ जैसे प्रसंग लोकजीवन की विविधता और सामाजिक व्यवहार को सामने रखते हैं। इनके माध्यम से आपसी संवाद, विश्वास और सामाजिक सौहार्द का संदेश देखने को मिलता है।
वहीं ‘राजा-रानी’ और ‘मीणा-बंजारा’ जैसे खेल समाज के अलग-अलग वर्गों और समुदायों के जीवन, संघर्ष और पारस्परिक संबंधों को मंच पर प्रस्तुत करते हैं। इन लोकप्रसंगों के माध्यम से सामाजिक समरसता, समान सम्मान और भेदभाव से ऊपर उठने का संदेश दिया जाता है।
संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
‘चित्तौड़ का किला’ जैसे प्रसंग इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव को दर्शाते हैं। वहीं ‘मधुमक्खी और भंवर’ जैसे प्रकृति आधारित प्रतीकों के माध्यम से पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण का संदेश भी सामने आता है।
गवरी की खासियत यह है कि इसका मंच केवल पुरानी कथाओं के मंचन तक सीमित नहीं रहता। लोकपात्रों, हास्य, व्यंग्य, संवाद और प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक विषयों पर भी विचार करने का अवसर मिलता है।
सामाजिक समरसता, गौ संरक्षण, पर्यावरण रक्षा, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों को लोकभाषा और लोकनाट्य के माध्यम से प्रस्तुत करने वाली गवरी आज भी मेवाड़ की समृद्ध लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए हुए है।